हड़प्पा सभ्यता में समाज की प्रकृति पर टिप्पणी
हड़प्पा सभ्यता, जिसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहा जाता है, भारत की प्राचीनतम और सर्वाधिक विकसित नगर सभ्यताओं में से एक थी। इसका विकास लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व के बीच हुआ। इस सभ्यता के प्रमुख केंद्र हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा, कालीबंगन और लोथल थे। हड़प्पा सभ्यता की विशेषता उसका सुव्यवस्थित सामाजिक ढाँचा, उन्नत नगर योजना और समृद्ध आर्थिक व्यवस्था थी। उपलब्ध पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर हड़प्पा सभ्यता के समाज की प्रकृति को समझा जा सकता है।
हड़प्पा सभ्यता का समाज एक संगठित और अनुशासित समाज प्रतीत होता है। नगरों की योजना से स्पष्ट होता है कि समाज में सामूहिक हितों को व्यक्तिगत हितों से अधिक महत्व दिया जाता था। शहरों को पूर्व-नियोजित ढंग से बसाया गया था, जिनमें चौड़ी और सीधी सड़कें, पक्के मकान, जल निकासी की उन्नत व्यवस्था और सार्वजनिक स्नानागार जैसे ढाँचे मौजूद थे। यह दर्शाता है कि समाज में प्रशासनिक नियंत्रण और सामाजिक अनुशासन दोनों ही सुदृढ़ थे।
हड़प्पा समाज की एक प्रमुख विशेषता उसकी सामाजिक समानता थी। उत्खनन से प्राप्त आवासों में अत्यधिक भेदभाव के प्रमाण नहीं मिलते। यद्यपि कुछ मकान बड़े और कुछ छोटे थे, फिर भी अमीर–गरीब के बीच अत्यधिक अंतर दिखाई नहीं देता। राजमहलों, विशाल मंदिरों या भव्य समाधियों का अभाव यह संकेत देता है कि समाज में किसी एक वर्ग का अत्यधिक प्रभुत्व नहीं था। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि हड़प्पा समाज अपेक्षाकृत समतावादी था।
इस सभ्यता में व्यवसाय आधारित सामाजिक संरचना विद्यमान थी। लोगों के जीवनयापन के साधन कृषि, पशुपालन, व्यापार और शिल्पकला पर आधारित थे। किसान, कारीगर, व्यापारी और संभवतः प्रशासक समाज के विभिन्न वर्गों का निर्माण करते थे। कुम्हार, लोहार, स्वर्णकार, मनका निर्माता और वस्त्र बुनने वाले जैसे शिल्पकारों के प्रमाण मिले हैं, जो समाज में श्रम विभाजन की स्पष्ट व्यवस्था को दर्शाते हैं। यह विभाजन सामाजिक संगठन की परिपक्वता को इंगित करता है।
हड़प्पा सभ्यता का समाज शहरी जीवन शैली से परिचित था। लोग पक्के ईंटों के मकानों में रहते थे, जिनमें आँगन, स्नानघर और कुएँ होते थे। स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जाता था, जैसा कि नालियों की उत्कृष्ट व्यवस्था से स्पष्ट होता है। यह दर्शाता है कि समाज स्वास्थ्य और सार्वजनिक स्वच्छता के प्रति जागरूक था। सामूहिक स्नानागार संभवतः सामाजिक या धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा होगा।
धार्मिक दृष्टि से हड़प्पा समाज सहिष्णु और बहुआयामी प्रतीत होता है। विभिन्न मुहरों पर अंकित प्रतीकों से मातृदेवी, पशुपति जैसी देव आकृतियों और पशु पूजा के संकेत मिलते हैं। धार्मिक गतिविधियाँ संभवतः व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर होती थीं। हालांकि बड़े मंदिरों का अभाव यह दर्शाता है कि समाज में धर्म का प्रभाव सीमित और संतुलित था, न कि अत्यधिक प्रभुत्वशाली।
हड़प्पा समाज में नारी की स्थिति अपेक्षाकृत सम्मानजनक मानी जाती है। मातृदेवी की मूर्तियाँ इस बात का संकेत देती हैं कि स्त्री को उर्वरता और सृजन की प्रतीक के रूप में देखा जाता था। हालांकि समाज में पुरुषों की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी, लेकिन स्त्री के प्रति तिरस्कार या दमन के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते। यह समाज की संतुलित प्रकृति को दर्शाता है।
व्यापार और वाणिज्य ने हड़प्पा समाज को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाया। आंतरिक और बाह्य व्यापार के माध्यम से समाज में समृद्धि आई। लोथल जैसे बंदरगाह नगर इस बात के प्रमाण हैं कि हड़प्पावासी दूर-दराज़ क्षेत्रों से संपर्क में थे। व्यापारिक गतिविधियों ने समाज में आपसी सहयोग और संगठन की भावना को मजबूत किया।
निष्कर्षतः, हड़प्पा सभ्यता का समाज एक सुव्यवस्थित, संगठित, अपेक्षाकृत समतावादी और उन्नत समाज था। इसमें सामाजिक अनुशासन, श्रम विभाजन, स्वच्छता, सहिष्णुता और आर्थिक सहयोग जैसे गुण विद्यमान थे। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि हड़प्पा समाज प्राचीन विश्व की सबसे विकसित और संतुलित सामाजिक संरचनाओं में से एक था, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप की भावी सभ्यताओं के लिए एक मजबूत आधार प्रदान किया।
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